| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| बोर्ड | SEBA (असम) |
| कक्षा | 10 |
| विषय | हिंदी |
| पाठ्यपुस्तक | आलोक |
| पाठ संख्या | 1 |
| पाठ का नाम | नींव की ईंट |
| पाठ का प्रकार | गद्य (ललित निबंध) |
| लेखक | रामवृक्ष बेनीपुरी |
| जन्म | 1902 ई., बेनीपुर गाँव, मुजफ्फरपुर (बिहार) |
| निधन | 1968 ई. |
| मुख्य विषय | समाज के अनाम बलिदानियों का महत्व |
| प्रतीक | नींव की ईंट = गुमनाम त्यागी कंगूरे की ईंट = यश-लोभी सेवक |
| प्रमुख रचनाएँ | गेहूँ और गुलाब, माटी की मूरतें, पतितों के देश में, चिता के फूल, अंबपाली |
| इस पोस्ट में | सारांश, शब्दार्थ, 31 अभ्यास प्रश्न-उत्तर, व्याकरण, 8 लेखक-प्रश्न, 10 MCQ, FAQ |
लेखक परिचय: रामवृक्ष बेनीपुरी (1902–1968)
- जन्म: 1902 ई., बेनीपुर गाँव, मुजफ्फरपुर जिला, बिहार।
- बचपन: माता-पिता का साया जल्दी उठ गया, इसलिए परवरिश ननिहाल में हुई।
- स्वतंत्रता संग्राम: मैट्रिक पास करने से पहले, 1920 में, वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़ गए। 1930 से 1942 तक का समय उन्हें जेल-यात्राओं में बिताना पड़ा।
- पत्रकारिता: उन्होंने 'तरुण भारत', 'किसान मित्र', 'बालक', 'युवक', 'कैदी', 'कर्मवीर', 'जनता', 'तूफान', 'हिमालय' और 'नई धारा' का संपादन किया।
- प्रमुख रचनाएँ: गेहूँ और गुलाब (निबंध व रेखाचित्र), वंदे वाणी विनायकौ (ललित गद्य), पतितों के देश में (उपन्यास), चिता के फूल (कहानी संग्रह), माटी की मूरतें (रेखाचित्र), अंबपाली (नाटक)।
- विशेषता: उनकी भाषा जीवंत, प्रवाहमयी और ओजपूर्ण है। रेखाचित्र, संस्मरण और ललित निबंध में उन्हें खास सफलता मिली।
- निधन: 1968 ई.।
অসমীয়াৰ অনুবাদ "নীংৱ কী ঈংট" (ভেটিৰ ইটা)
সেই যে জিলিকি থকা, সুন্দৰ, সুগঠিত অট্টালিকাখন, সি কিহৰ ওপৰত থিয় হৈ আছে? ইয়াৰ চূড়াবোৰ আপুনি চাই থাকে, কিন্তু আপুনি কেতিয়াবা ইয়াৰ ভেটিৰ ফালে মনোযোগ দিছেনে?
পৃথিৱীয়ে জিলিকনি দেখে, ওপৰৰ আৱৰণ দেখে। আৱৰণৰ তলত থকা কঠিন সত্যলৈ কিমানজন মানুহৰ মন যায়?
কঠিন 'সত্য' সদায় 'শিৱ' (কল্যাণকাৰী) হয়েই, কিন্তু সি সদায় 'সুন্দৰম্'ও হ'বই লাগিব, এনে কোনো কথা নাই।
সত্য কঠোৰ হয়। কঠোৰতা আৰু কুৎসিততা একেলগে জন্ম লয়, একেলগে জীয়াই থাকে। আমি কঠোৰতাৰ পৰা পলাওঁ, কুৎসিততাৰ পৰা মুখ ঘূৰাওঁ। সেইবাবেই সকলোৱে সত্যৰ পৰা পলায়। নহ'লে আমি অট্টালিকাৰ গীত ভেটিৰ গীতেৰে আৰম্ভ কৰিলোহেঁতেন।
সেই ইটা ধন্য, যি কাটি-ছাঁটি চূড়াত উঠে আৰু বহুতো মানুহৰ চকু নিজৰ ফালে আকৰ্ষণ কৰে।
কিন্তু ধন্য সেই ইটা, যি মাটিৰ সাত হাত তললৈ গৈ পুতি থাকিল আৰু অট্টালিকাৰ প্ৰথম ইটা হ'ল!
কিয়নো এই প্ৰথম ইটাৰ ওপৰতে অট্টালিকাখনৰ দৃঢ়তা আৰু স্থায়িত্ব নিৰ্ভৰ কৰে, আৰু তাৰ ওপৰতেই গোটেই অট্টালিকাৰ অস্তিত্ব-নাস্তিত্ব নিৰ্ভৰ কৰে।
সেই ইটাক লৰাই দিয়ক, চূড়া নিশ্চিতভাৱে মাটিত পৰি যাব।
চূড়াৰ গীত গোৱা আমি, আহক, এতিয়া ভেটিৰ গীত গাওঁ।
সেই ইটা, যি মাটিত এইবাবে পুতি থাকিল যাতে পৃথিৱীয়ে অট্টালিকা পায়, চূড়া পায়!
সেই ইটা, যি আটাইবোৰ ইটাতকৈ বেছি পকী আছিল, যি ওপৰত লগোৱা হ'লে চূড়াৰ শোভা শগুণে বঢ়াই দিলেহেঁতেন!
কিন্তু যিজনে দেখিলে যে অট্টালিকাৰ স্থায়িত্ব তাৰ ভেটিৰ ওপৰতে নিৰ্ভৰ কৰে, সেইবাবে তেওঁ নিজকে ভেটিত উৎসৰ্গা কৰিলে।
সেই ইটা, যি নিজকে সাত হাত মাটিৰ তলত এইবাবে পুতি দিলে যাতে অট্টালিকা মাটিৰ ওপৰত শ হাত ওপৰলৈকে যাব পাৰে।
সেই ইটা, যি নিজৰ বাবে ঘোৰ অন্ধকাৰ এইবাবে গ্ৰহণ কৰিলে যাতে ওপৰৰ তাৰ সংগীবোৰে স্বচ্ছ বতাহ পাই থাকে, সোণালী পোহৰ পাই থাকে।
সেই ইটা, যি নিজৰ অস্তিত্ব এইবাবে বিলীন কৰি দিলে যাতে সংসাৰে এক সুন্দৰ সৃষ্টি দেখে।
সুন্দৰ সৃষ্টি! সুন্দৰ সৃষ্টিয়ে সদায় বলিদান বিচাৰে, সেই বলিদান ইটাৰ হওক বা ব্যক্তিৰ।
সুন্দৰ অট্টালিকা হওক, সেইবাবে কিছুমান পকী-পকী ৰাঙলী ইটাক নিঃশব্দে ভেটিত যাব লাগিব।
সুন্দৰ সমাজ গঢ়ি উঠক, সেইবাবে কিছুমান তপ্ত-পোৰ খোৱা (পৰীক্ষিত) মানুহে নিৰৱ শাহাদতৰ ৰাঙলী সেহেৰা (মুকুট) পিন্ধিব লাগিব।
শাহাদত আৰু নিৰৱতা! যি শাহাদতে খ্যাতি লাভ কৰিলে, যি বলিদানে প্ৰসিদ্ধি পালে, সি অট্টালিকাৰ চূড়া—মন্দিৰৰ কলস।
হয়, শাহাদত আৰু নিৰৱতা! সমাজৰ আধাৰশিলা এইটোৱেই হয়।
যীচুৰ শাহাদতে খ্ৰীষ্টান ধৰ্মক অমৰ কৰি দিলে, আপুনি কৈ ল'ব পাৰে। কিন্তু মোৰ বিবেচনাত খ্ৰীষ্টান ধৰ্মক অমৰ কৰিলে সেই লোকসকলে, যিসকলে সেই ধৰ্মৰ প্ৰচাৰত নিজকে নামবিহীনভাৱে উৎসৰ্গা কৰি দিলে। তেওঁলোকৰ ভিতৰত কিমানজনক জীয়াই জ্বলোৱা হ'ল, কিমানজনক শূলত তোলা হ'ল, কিমানজন বনে-বনে ঘূৰি ফুৰি হিংস্ৰ জন্তুৰ চিকাৰ হ'ল, আৰু কিমানজন তাতকৈও ভয়ংকৰ ভোক-পিয়াহৰ চিকাৰ হ'ল।
তেওঁলোকৰ নাম হয়তো কतো লিখা হোৱা নাই, তেওঁলোকৰ আলোচনা হয়তো কতো নহয়, কিন্তু খ্ৰীষ্টান ধৰ্ম তেওঁলোকৰে পুণ্য-প্ৰতাপত ফুলি-জাতিছে।
তেওঁলোকেই আছিল ভেটিৰ ইটা; গিৰ্জাঘৰৰ কলসবোৰ তেওঁলোকৰ শাহাদতৰ বাবেই জিলিকি আছে।
আজি আমাৰ দেশ স্বাধীন হৈছে, কেৱল সেইসকলৰ বলিদানৰ বাবেই নহয়, যিসকলে ইতিহাসত ঠাই পালে।
দেশৰ হয়তো এনে কোনো চুক নাই, য'ত এনে কিছুমান দধীচি হোৱা নাই, যিসকলৰ হাড়ৰ দানেই বিদেশী বৃত্ৰাসুৰক নাশ কৰিলে।
আমি যাক দেখা নাপাওঁ, সি সত্য নহয়, এয়া এক মূঢ় ধাৰণা!
বিচাৰিলেহে সত্য পোৱা যায়। আমাৰ কাম, আমাৰ ধৰ্ম হ'ল এনে ভেটিৰ ইটাবোৰৰ ফালে মনোযোগ দিয়া।
বহু শতিকাৰ পাছত নতুন সমাজ সৃষ্টিৰ ফালে আমি প্ৰথম খোজ আগবঢ়াইছো।
এই নতুন সমাজ নিৰ্মাণৰ বাবেও আমাক ভেটিৰ ইটা লাগে। দুখৰ কথা, চূড়া হ'বলৈ চাৰিওফালে হুৰাহুৰি লাগিছে, ভেটিৰ ইটা হোৱাৰ কামনা লুপ্ত হৈ আহিছে!
সাত লাখ গাঁৱৰ নৱ-নিৰ্মাণ! হাজাৰ হাজাৰ নগৰ আৰু কাৰখানাৰ নৱ-নিৰ্মাণ! কোনো শাসকে এইটো সম্ভৱ কৰিব নোৱাৰে। এনে যুৱকৰ প্ৰয়োজন, যিসকলে এই কামত নিজকে নিঃশব্দে ক্ষয় কৰি দিব।
যিসকল এক নতুন প্ৰেৰণাৰে অনুপ্ৰাণিত, এক নতুন চেতনাৰে আপ্লুত; যিসকল প্ৰশংসাৰ পৰা দূৰত আৰু দলাদলিৰ পৰা আতৰত।
যিসকলৰ মনত চূড়া হোৱাৰ কামনা নাই, কলস বুলি কোৱাব খোজাৰ বাসনা নাই। সকলো কামনাৰ পৰা দূৰত, সকলো বাসনাৰ পৰা দূৰত।
উদয়ৰ বাবে আতুৰ আমাৰ সমাজে চিঞৰি আছে। আমাৰ ভেটিৰ ইটাবোৰ ক'ত আছে? দেশৰ যুৱকসকলৰ প্ৰতি এয়া এক আহ্বান!
भूमिका
किसी बड़े शहर की ऊँची इमारत के सामने खड़े होकर हम अक्सर उसकी बनावट, उसकी चमक और उसके शिखर की तारीफ़ करते हैं। कोई उसके रंग की बात करता है, कोई खिड़कियों की, तो कोई सबसे ऊपर लगे कंगूरे की। लेकिन क्या हमने कभी रुककर सोचा है कि यह पूरा ढाँचा आखिर किस सहारे खड़ा है? ज़मीन के भीतर, अँधेरे में दबी वे साधारण ईंटें, जिन्हें किसी ने कभी देखा तक नहीं, पूरी इमारत का बोझ चुपचाप उठाए रहती हैं। यही सीधा-सा सवाल कक्षा 10 की हिंदी पाठ्यपुस्तक 'आलोक' के पहले पाठ 'नींव की ईंट' की आत्मा है।
आज के दौर में यह विषय और भी ज़रूरी हो गया है। सोशल मीडिया के इस समय में हर व्यक्ति चाहता है कि लोग उसे देखें, सराहें और याद रखें। दिखने की इस दौड़ में चुपचाप अपना काम करने वाले लोग पीछे छूटते जाते हैं। बेनीपुरी जी ने दशकों पहले जो चिंता जताई थी, वह आज भी उतनी ही सच्ची है। यही कारण है कि यह पाठ केवल साहित्य की किताब का एक अध्याय नहीं, जीवन को समझने की एक सीख भी है। विद्यार्थियों के लिए यह निबंध हमें देखने का एक नया नज़रिया देता है। अपने आसपास नज़र दौड़ाइए। घर में सुबह से रात तक काम करने वाली माँ, खेत में पसीना बहाने वाला किसान, सीमा पर तैनात सैनिक और कक्षा में पढ़ाने वाले शिक्षक, ये सब किसी न किसी रूप में नींव की ईंट ही हैं। इनके नाम अख़बारों की सुर्खियों में नहीं आते, फिर भी इनके बिना समाज की इमारत एक दिन भी नहीं टिक सकती।
इस पोस्ट में हमने पाठ का सरल सार, लेखक का परिचय, कठिन शब्दों के अर्थ, प्रतीकार्थ और अभ्यासमाला के सभी प्रश्नों के उत्तर एक ही जगह रखे हैं। उत्तर इस तरह लिखे गए हैं कि छात्र उन्हें समझकर अपनी भाषा में लिख सकें और उन्हें रटना न पड़े। अगर आप असम बोर्ड या किसी अन्य बोर्ड की कक्षा 10 की परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो यह सामग्री आपके काम आएगी। तो आइए, लेखक और पाठ की पृष्ठभूमि को समझते हुए इस प्रेरक निबंध की यात्रा शुरू करें
पाठ का सार
लेखक पूछते हैं कि जो इमारत इतनी चमकीली और सुंदर दिखती है, वह टिकी किस पर है। लोग कंगूरे देखते हैं, नींव की तरफ़ किसी का ध्यान नहीं जाता। कारण यह है कि सच कठोर होता है और इंसान कठोरता से बचना चाहता है। इसी वजह से लोग सच से भी दूर भागते हैं।लेखक के अनुसार वह ईंट भी धन्य है जो तराशी जाकर कंगूरे पर चढ़ती है, पर उससे ज़्यादा धन्य वह ईंट है जो ज़मीन के सात हाथ नीचे दबकर इमारत की पहली ईंट बनी। उसी के दम पर पूरी इमारत की मजबूती टिकी है। उसे हिला दो तो कंगूरा तुरंत ज़मीन पर आ जाएगा।लेखक एक और उदाहरण देते हैं: सुंदर समाज बनाने के लिए भी कुछ लोगों को चुपचाप शहादत का सेहरा पहनना पड़ता है। ईसाई धर्म को अमर बनाने वाले ईसा के वे अनाम अनुयायी थे, जिन्होंने प्रचार में अपना जीवन खपा दिया। उनके नाम कहीं दर्ज नहीं, पर गिरजाघरों के कलश उन्हीं की शहादत से चमकते हैं।अंत में लेखक देश की आज़ादी की बात करते हैं। आज़ादी सिर्फ़ उन्हीं की कुर्बानियों से नहीं मिली जिनके नाम इतिहास में दर्ज हैं। देश के हर कोने में ऐसे गुमनाम दधीचि हुए हैं, जिनकी हड्डियों के दान से विदेशी वृत्रासुर का अंत हुआ। अब सात लाख गाँवों और हज़ारों शहरों के नव-निर्माण के लिए ऐसे नौजवान चाहिए जो बिना नाम और यश की चाह के चुपचाप खप जाएँ। पर आज हर कोई कंगूरा बनना चाहता है और नींव की ईंट बनने की इच्छा खत्म हो रही है। यही नौजवानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
कठिन शब्दों के अर्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सुघड़ | सुंदर आकार वाला |
| इमारत | बड़ा पक्का भवन |
| बरबस | बलपूर्वक |
| पुख्तापन | मजबूती, दृढ़ता |
| बेतहाशा | जल्दी से, तेज़ी से |
| मुनहसिर | आश्रित, निर्भर |
| विलीन | मिटा देना |
| शोहरत | प्रसिद्धि, यश |
| अस्ति-नास्ति | होना-न होना, अस्तित्व |
| पायदारी | टिकाऊपन |
| अंधकूप | अंधकार भरा नीचा स्थान |
| शहादत | बलिदान |
| कलश | मंदिर का सबसे ऊपरी भाग |
| कंगूरा | भवन का सबसे ऊपरी भाग |
| उत्सर्ग | न्योछावर, बलिदान |
| वृत्रासुर | एक अत्याचारी राक्षस |
| मूढ़ | मूर्ख |
| अनुप्राणित | प्रेरित, प्रोत्साहित |
| होड़ा-होड़ी | प्रतिस्पर्धा |
| चुनौती | ललकार |
अभ्यासमाला: बोध एवं विचार
प्रश्न 1. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो:
(क) रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म कहाँ हुआ था?उत्तर: रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म 1902 ई. में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बेनीपुर नामक गाँव में हुआ था।
(ख) बेनीपुरी जी को जेल की यात्राएँ क्यों करनी पड़ी थीं?
उत्तर: बेनीपुरी जी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सक्रिय सेनानी थे, इसलिए उन्हें 1930 से 1942 तक कई बार जेल जाना पड़ा।
(ग) बेनीपुरी जी का स्वर्गवास कब हुआ था?
उत्तर: बेनीपुरी जी का स्वर्गवास 1968 ई. में हुआ था।
(घ) चमकीली, सुंदर, सुघड़ इमारत वस्तुतः किस पर टिकी होती है?
उत्तर: चमकीली, सुंदर और सुघड़ इमारत वस्तुतः अपनी नींव की ईंटों पर टिकी होती है।
(ङ) दुनिया का ध्यान सामान्यतः किस पर जाता है?
उत्तर: दुनिया का ध्यान सामान्यतः इमारत की चमक-दमक और ऊपरी आवरण, यानी कंगूरे पर जाता है।
(च) नींव की ईंट को हिला देने का परिणाम क्या होगा?
उत्तर: नींव की ईंट को हिला देने पर इमारत का कंगूरा तुरंत ज़मीन पर आ गिरेगा, क्योंकि पूरी इमारत उसी पर टिकी है।
(छ) सुंदर सृष्टि हमेशा ही क्या खोजती है?
उत्तर: सुंदर सृष्टि हमेशा बलिदान खोजती है, चाहे वह ईंट का हो या किसी व्यक्ति का।
(ज) लेखक के अनुसार गिरजाघरों के कलश वस्तुतः किनकी शहादत से चमकते हैं?
उत्तर: लेखक के अनुसार गिरजाघरों के कलश उन अनाम लोगों की शहादत से चमकते हैं जिन्होंने ईसाई धर्म के प्रचार में चुपचाप अपना जीवन अर्पित कर दिया।
(झ) आज किसके लिए चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है?
उत्तर: आज कंगूरे की ईंट बनने के लिए, यानी नाम, यश और प्रसिद्धि पाने के लिए, चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है।
(ञ) पठित निबंध में 'सुंदर इमारत' का आशय क्या है?
उत्तर: पठित निबंध में 'सुंदर इमारत' का आशय एक नया, सुंदर और सशक्त समाज है।
प्रश्न 2. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में):
प्रश्न 3. संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में):
(क) मनुष्य सुंदर इमारत के कंगूरे को तो देखा करते हैं, पर उसकी नींव की ओर उनका ध्यान क्यों नहीं जाता?उत्तर: मनुष्य को चमक-दमक और ऊपरी दिखावा आकर्षित करता है, इसलिए वह कंगूरे को देखता है। नींव की ईंट ज़मीन के भीतर दबी होती है और दिखाई नहीं देती। साथ ही नींव का सत्य कठोर होता है और मनुष्य कठोरता से बचना चाहता है, इसलिए उसका ध्यान उधर नहीं जाता।
(ख) लेखक ने कंगूरे के गीत गाने के बजाय नींव के गीत गाने के लिए क्यों आह्वान किया है?
उत्तर: लेखक का मानना है कि इमारत की असली ताकत उसकी नींव है, कंगूरा नहीं। नींव हिलते ही कंगूरा ज़मीन पर आ जाता है। इसलिए वे चाहते हैं कि हम दिखावे की जगह उन गुमनाम त्यागियों का सम्मान करें जिनके बलिदान पर समाज और राष्ट्र की इमारत खड़ी है।
(ग) सामान्यतः लोग कंगूरे की ईंट बनना तो पसंद करते हैं, परंतु नींव की ईंट बनना क्यों नहीं चाहते?
उत्तर: कंगूरे की ईंट बनने पर नाम, यश और प्रशंसा मिलती है, जबकि नींव की ईंट बनने पर गुमनामी और त्याग सहना पड़ता है। लोग शोहरत और शाबाशी के भूखे होते हैं। नींव की ईंट बनने के लिए बिना किसी स्वार्थ के चुपचाप खप जाने का साहस चाहिए, जो हर किसी में नहीं होता।
(घ) लेखक ईसाई धर्म को अमर बनाने का श्रेय किन्हें देना चाहता है और क्यों?
उत्तर: लेखक यह श्रेय ईसा मसीह के उन अनाम अनुयायियों को देना चाहता है जिन्होंने धर्म-प्रचार में अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। उनमें से कई जिंदा जलाए गए, सूली पर चढ़े और भूख-प्यास का शिकार हुए। उनके नाम कहीं दर्ज नहीं, पर उन्हीं के बलिदान से ईसाई धर्म फल-फूल रहा है।
(ङ) हमारा देश किनके बलिदानों के कारण आज़ाद हुआ?
उत्तर: हमारा देश केवल उन्हीं के बलिदानों से आज़ाद नहीं हुआ जिन्होंने इतिहास में स्थान पा लिया है। देश के हर कोने में ऐसे अनगिनत गुमनाम सेनानी हुए हैं जिन्होंने चुपचाप अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। उन्हीं अनाम शहीदों के त्याग से देश को आज़ादी मिली।
(च) दधीचि मुनि ने किसलिए और किस प्रकार अपना बलिदान किया था?
उत्तर: दधीचि एक प्रसिद्ध ऋषि थे। देवताओं के राजा इंद्र को अत्याचारी राक्षस वृत्रासुर का वध करना था, जिसके लिए वज्र चाहिए था। वज्र बनाने के लिए दधीचि ने अपनी हड्डियों का दान कर दिया। इस प्रकार उन्होंने लोककल्याण के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया।
(छ) भारत के नव-निर्माण के बारे में लेखक ने क्या कहा है?
उत्तर: लेखक के अनुसार भारत के सात लाख गाँवों, हज़ारों शहरों और कारखानों का नव-निर्माण करना है। इसे कोई अकेला शासक संभव नहीं बना सकता। इसके लिए ऐसे नौजवान चाहिए जो नाम और यश की कामना छोड़कर, नई प्रेरणा से, इस कार्य में चुपचाप अपने को खपा दें।
(ज) 'नींव की ईंट' शीर्षक निबंध का संदेश क्या है?
उत्तर: इस निबंध का संदेश यह है कि समाज और राष्ट्र की मजबूती उन गुमनाम लोगों के त्याग पर टिकी है जो बिना प्रसिद्धि की चाह के काम करते हैं। हमें दिखावे और यश के पीछे भागने के बजाय नींव की ईंट की तरह निस्वार्थ भाव से राष्ट्र-निर्माण में योगदान देना चाहिए।
प्रश्न 4. सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में):
(क) 'नींव की ईंट' का प्रतीकार्थ स्पष्ट करो।उत्तर: 'नींव की ईंट' समाज के उन अनाम शहीदों और त्यागी सेवकों का प्रतीक है जो बिना नाम, यश या प्रशंसा की चाह के समाज के नव-निर्माण में अपना जीवन खपा देते हैं। जैसे ज़मीन के भीतर दबी ईंट पूरी इमारत का भार उठाती है पर किसी को दिखाई नहीं देती, वैसे ही ये लोग गुमनाम रहकर राष्ट्र और समाज को मजबूती देते हैं। भारत की आज़ादी की लड़ाई में चुपचाप बलिदान देने वाले असंख्य सेनानी इसी नींव की ईंट थे। लेखक चाहते हैं कि नई पीढ़ी भी दिखावे से दूर रहकर यही भूमिका निभाए।
(ख) 'कंगूरे की ईंट' के प्रतीकार्थ पर सम्यक् प्रकाश डालो।
उत्तर: 'कंगूरे की ईंट' उस यश-लोभी व्यक्ति का प्रतीक है जो समाज की सेवा केवल प्रसिद्धि, प्रशंसा या किसी स्वार्थ के लिए करना चाहता है। कंगूरा इमारत के सबसे ऊपर होता है, इसलिए सबको दिखता है और उसकी तारीफ़ होती है। पर इमारत की मजबूती उस पर नहीं टिकी होती। लेखक के अनुसार स्वतंत्र भारत के शासक और नेता, जो आज़ादी के बाद सामने आए, कंगूरे की ईंट निकले। आज हर कोई नाम और पद पाने की होड़ में कंगूरा बनना चाहता है। लेखक इसी प्रवृत्ति पर चिंता जताते हैं।
(ग) 'हाँ, शहादत और मौन-मूक! समाज की आधारशिला यही होती है'—का आशय बताओ।
उत्तर: इस कथन का आशय है कि समाज की असली नींव वे लोग होते हैं जो चुपचाप बलिदान देते हैं और उसका प्रचार नहीं करते। जिस शहादत को शोहरत मिल जाती है, वह कंगूरे या कलश की तरह दिखने लगती है। पर समाज को टिकाए रखने वाली शहादत वह है जो मौन रहकर, बिना किसी की नज़र में आए, दी गई हो। ऐसे गुमनाम बलिदानी ही किसी राष्ट्र या समाज की सच्ची आधारशिला होते हैं, और उन्हीं के त्याग पर सुंदर समाज की इमारत खड़ी होती है।
प्रश्न 5. सप्रसंग व्याख्या करो:
(क) "हम कठोरता से भागते हैं, भदेपन से मुख मोड़ते हैं, इसीलिए सच से भी भागते हैं।"संदर्भ: यह गद्यांश रामवृक्ष बेनीपुरी के ललित निबंध 'नींव की ईंट' से लिया गया है।
प्रसंग: लेखक बता रहे हैं कि लोग इमारत की चमक देखते हैं, पर उसकी नींव पर ध्यान नहीं देते। इस उपेक्षा का कारण वे यहाँ बताते हैं।
व्याख्या: लेखक के अनुसार सत्य कठोर होता है और कठोरता के साथ भद्दापन भी जुड़ा रहता है। मनुष्य सुख और सुंदरता पसंद करता है, इसलिए कठोर और अप्रिय स्थितियों से बचता है। इसी प्रवृत्ति के कारण वह सत्य का सामना करने से भी कतराता है। नींव की ईंट सत्य का प्रतीक है, जो कठोर और अदृश्य है, इसलिए उसकी ओर हमारा ध्यान नहीं जाता।
विशेष: भाषा सरल और भावपूर्ण है, शैली विचारात्मक है।
(ख) "सुंदर सृष्टि! सुंदर सृष्टि, हमेशा बलिदान खोजती है, बलिदान ईंट का हो या व्यक्ति का।"
संदर्भ: यह पंक्ति 'नींव की ईंट' निबंध से ली गई है।
प्रसंग: लेखक यह समझा रहे हैं कि जिस ईंट ने स्वयं को अंधकार में गाड़ दिया, उसके त्याग से ही इमारत सुंदर बन पाई।
व्याख्या: किसी भी सुंदर रचना के पीछे किसी न किसी का बलिदान होता है। इमारत सुंदर बने, इसके लिए कुछ पक्की ईंटों को चुपचाप नींव में दबना पड़ता है। इसी तरह सुंदर समाज बनाने के लिए कुछ लोगों को अपना सुख, नाम और जीवन तक त्यागना पड़ता है। निर्माण चाहे इमारत का हो या समाज का, बिना त्याग के संभव नहीं।
विशेष: 'सुंदर सृष्टि' की पुनरुक्ति से भाव में बल आया है।
(ग) "अफसोस, कंगूरा बनने के लिए चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है, नींव की ईंट बनने की कामना लुप्त हो रही है!"
संदर्भ: यह वाक्य 'नींव की ईंट' निबंध के अंतिम भाग से है।
प्रसंग: लेखक नए समाज के निर्माण की ज़रूरत बता रहे हैं और आज की स्वार्थी प्रवृत्ति पर दुख जता रहे हैं।
व्याख्या: लेखक को खेद है कि आज हर व्यक्ति नाम, पद और प्रसिद्धि पाना चाहता है। कोई भी चुपचाप सेवा करने वाला, गुमनाम रहने वाला नहीं बनना चाहता। जबकि सात लाख गाँवों और हज़ारों शहरों का नव-निर्माण तभी होगा जब नौजवान बिना यश की चाह के काम करेंगे। नींव की ईंट बनने की भावना का घटना राष्ट्र के लिए चिंता की बात है।
विशेष: 'अफसोस' शब्द से लेखक की व्यथा झलकती है।
भाषा एवं व्याकरण-ज्ञान
- चमकीली: दुकान में सजी चमकीली साड़ी सबको पसंद आई।
- कठोरता: अनुशासन के लिए कभी-कभी कठोरता भी ज़रूरी होती है।
- बेतहाशा: बारिश शुरू होते ही बच्चे बेतहाशा घर की ओर दौड़े।
- भयानक: रात में जंगल का सन्नाटा बहुत भयानक लग रहा था।
- गिरजाघर: क्रिसमस पर गिरजाघर को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया गया।
- इतिहास: भारत का इतिहास वीरता और बलिदान की कहानियों से भरा है।
| अशुद्ध | शुद्ध |
| (क) नहीं तो, हम इमारत की गीत नींव की गीत से प्रारंभ करते। | नहीं तो, हम इमारत का गीत नींव के गीत से प्रारंभ करते। |
| (ख) ईसाई धर्म उन्हीं के पुण्य-प्रताप से फल-फूल रहे हैं। | ईसाई धर्म उन्हीं के पुण्य-प्रताप से फल-फूल रहा है। |
| (ग) सदियों के बाद नए समाज की सृष्टि की ओर हम पहला कदम बढ़ाए हैं। | सदियों के बाद नए समाज की सृष्टि की ओर हमने पहला कदम बढ़ाया है। |
| (घ) हमारे शरीर पर कई अंग होते हैं। | हमारे शरीर में कई अंग होते हैं। |
| (ङ) हम निम्नलिखित रूपनगर के निवासी प्रार्थना करते हैं। | हम रूपनगर के निवासी निम्नलिखित प्रार्थना करते हैं। |
| (च) सब ताजमहल की सौंदर्यता पर मोहित होते हैं। | सब ताजमहल के सौंदर्य पर मोहित होते हैं। |
| (छ) गत रविवार को वह मुंबई जाएगा। | गत रविवार को वह मुंबई गया। |
| (ज) आप कृपया हमारे घर आने की कृपा करें। | आप हमारे घर आने की कृपा करें। |
| (झ) हमें अभी बहुत बातें सीखना है। | हमें अभी बहुत बातें सीखनी हैं। |
| (ञ) मुझे यह निबंध पढ़कर आनंद का आभास हुआ। | मुझे यह निबंध पढ़कर आनंद की अनुभूति हुई। |
| शब्द | अर्थ 1 | अर्थ 2 |
|---|---|---|
| अंबर | आकाश | वस्त्र |
| उत्तर | जवाब | एक दिशा |
| काल | समय | मृत्यु |
| नव | नया | नौ (संख्या) |
| पत्र | चिट्ठी | पत्ता |
| मित्र | दोस्त | सूर्य |
| वर्ण | अक्षर | रंग |
| हार | पराजय | माला |
| कल | बीता या आने वाला दिन | मशीन |
| कनक | सोना | धतूरा |
| शब्द-जोड़ा | अंतर |
| अगम-दुर्गम | अगम: जहाँ पहुँचा न जा सके। दुर्गम: जहाँ कठिनाई से पहुँचा जाए। |
| अपराध-पाप | अपराध: कानून के विरुद्ध काम। पाप: धर्म या नैतिकता के विरुद्ध काम। |
| अस्त्र-शस्त्र | अस्त्र: फेंककर चलाया जाने वाला हथियार (तीर)। शस्त्र: हाथ में पकड़कर चलाया जाने वाला (तलवार)। |
| आधि-व्याधि | आधि: मानसिक कष्ट। व्याधि: शारीरिक रोग। |
| दुख-खेद | दुख: सामान्य पीड़ा। खेद: किसी भूल या घटना पर पछतावा। |
| स्त्री-पत्नी | स्त्री: नारी जाति की कोई भी सदस्य। पत्नी: विवाहित स्त्री। |
| आज्ञा-अनुमति | आज्ञा: बड़ों का आदेश। अनुमति: किसी काम के लिए दी गई स्वीकृति। |
| अहंकार-गर्व | अहंकार: घमंड, बुरा भाव। गर्व: अपनी उपलब्धि पर सम्मान का भाव। |
योग्यता-विस्तार
- बेनीपुरी के निबंध 'मशाल' और 'गेहूँ और गुलाब': पुस्तकालय या इंटरनेट से पढ़ें। 'गेहूँ' भौतिक ज़रूरत का और 'गुलाब' सौंदर्य व संस्कृति का प्रतीक है। निबंध का संदेश है कि मनुष्य को दोनों का संतुलन चाहिए। यह बात सहपाठियों को अपने शब्दों में बताएँ।
- ललित निबंध की विशेषताएँ: इसमें लेखक का व्यक्तित्व झलकता है। भाषा भावपूर्ण और काव्यात्मक होती है, शैली व्यक्तिगत और रोचक होती है, और विचार के साथ कल्पना का मेल रहता है।

